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बिहार की सियासत में ‘हार की जीत’: क्या कमल खिलकर भी रह गया अधूरा?

अमृत विहार न्यूज

विश्लेषण | दिलीप विश्वकर्मा

Edited By|Gautamm Upadhyay

प्रसिद्ध कथाकार सुदर्शन ने वर्ष 1920 में एक कालजयी कहानी लिखी थी— ‘हार की जीत’। बाबा भारती, उनके प्रिय घोड़े ‘सुल्तान’ और डाकू खड्ग सिंह के इर्द-गिर्द बुनी यह कहानी आज सदी भर बाद बिहार के सियासी गलियारों में चरितार्थ होती दिख रही है। बिहार की सत्ता का हालिया स्थानांतरण महज एक गठबंधन का बदलाव नहीं, बल्कि ‘शह और मात’ के खेल में एक ऐसी पहेली है, जहाँ जीत और हार की परिभाषाएं धुंधली पड़ गई हैं।

नीतीश कुमार: हार कर भी जो जीत गए

कहानी में खड्ग सिंह ने छल से घोड़ा छीना था, लेकिन बाबा भारती के एक शब्द ने उसका हृदय बदल दिया। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने लगभग दो दशकों तक सत्ता की कमान अपने हाथ में रखी। आज जब वह अपनी विरासत का एक बड़ा हिस्सा भाजपा और सम्राट चौधरी को सौंप रहे हैं, तो इसे उनकी विदाई के रूप में देखा जा रहा था।लेकिन, नीतीश कुमार की राजनीतिक कुशलता देखिए—वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी राष्ट्रीय राजनीति और राज्यसभा की राह चुनकर अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखे हुए हैं। उन्होंने सत्ता हस्तांतरित तो की, लेकिन अपनी शर्तों और अपनी ‘समाजवादी साख’ को बचाते हुए। राजनीति के इस अध्याय में वे उस बाबा भारती की तरह उभरे हैं, जिसने घोड़ा खोकर भी अपना नैतिक प्रभाव नहीं खोया।

भाजपा: जीत की चमक में ‘हार’ की कसक?

दूसरी ओर भाजपा है, जो वर्षों से बिहार की धरती पर अपने दम पर ‘पूर्ण कमल’ खिलाने की फिराक में थी। सम्राट चौधरी के रूप में पार्टी को एक ऐसा नेतृत्व मिला है जिसकी जड़ें लालू यादव और नीतीश कुमार की ‘समाजवादी पाठशाला’ में रही हैं। भाजपा सत्ता में तो आई, सम्राट चौधरी को कमान भी मिली, लेकिन क्या यह वही ‘पूर्ण विजय’ है जिसका सपना संगठन ने देखा था?लेखक का मानना है कि कमल तो खिला, लेकिन उसकी पंखुड़ियों पर अब भी गठबंधन और पुराने समाजवाद का साया है। भाजपा जीतकर भी कहीं न कहीं उस पूर्ण वर्चस्व से दूर रह गई, जिसकी उसे तलाश थी।

सम्राट चौधरी और समाजवाद का नया संगम

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर दिलचस्प रहा है। राजद से जदयू और फिर भाजपा तक का उनका मार्ग यह दर्शाता है कि बिहार में शुद्ध विचारधारा से कहीं ज्यादा ‘व्यावहारिक राजनीति’ और ‘सामाजिक समीकरण’ मायने रखते हैं। उनकी विरासत समाजवाद की है, लेकिन कंधों पर जिम्मेदारी भगवा ध्वज को और ऊंचा ले जाने की है।

निष्कर्ष: सुबह का इंतज़ार

बिहार की राजनीति के इस मोड़ पर यह कहना गलत नहीं होगा कि यहाँ ‘सुल्तान’ (सत्ता) की लगाम तो बदल गई है, लेकिन खेल के नियम आज भी पुराने खिलाड़ी ही तय कर रहे हैं। भाजपा के लिए बिहार में उस ‘पूर्ण प्रभात’ का इंतजार अभी भी बाकी है, जहाँ वह बिना किसी बैसाखी के खड़ी हो सके। फिलहाल, बिहार की यह सत्ता परिवर्तन की कहानी सुदर्शन की कहानी की तरह ही एक गहरा संदेश दे रही है— यहाँ जो हार रहा है वह जीत रहा है, और जो जीत रहा है उसके हिस्से में भी एक अजीब सी कसक बाकी है।

नोट:-विश्लेषक एक अनुभवी पत्रकार हैं बिहार के बड़े अखबार के लिए खबर संकलन करते हैं।

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