अमृत विहार न्यूज

स्पेशल स्टोरी: गौतम उपाध्याय
बिहार के औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड अंतर्गत मलहद पंचायत को उसके सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के चलते “कलाओं का केंद्र” कहा जाए तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसी गांव में स्थित है श्री राम जानकी मंदिर (बड़ाठाकुरबाड़ी, मलहद), जिसकी स्थापना 1843 में साधु बाबा पाठक हनुमान दास जी महाराज ने की थी। इस प्राचीन धरोहर के संरक्षण एवं पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी अब श्री सीताराम सेवा समिति ने उठाई है।
समिति ने न केवल मंदिर की मरम्मत और विस्तार का संकल्प लिया है, बल्कि इस कार्य में क्षेत्रीय समाज की सक्रिय भागीदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की बात कही है। मंदिर निर्माण के लिए जनसमुदाय से आर्थिक सहयोग लिया जाएगा और कार्य की हर प्रक्रिया समिति की निगरानी में होगी। समिति का कहना बिल्कुल स्पष्ट है— “हमारा उद्देश्य केवल पत्थर खड़ा करना नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक गढ़ना है। हमें नल-नील जैसे बुद्धिमान और हनुमान जी जैसे कर्मयोगी की ही सलाह और सहभागिता चाहिए।” यही सोच मलहद की परंपरागत एकता और श्रद्धा की मिसाल है।मलहद ग्राम में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक लीला—श्रीराम विवाह महोत्सव—का यह 164वाँ वर्ष है। पुराने समय से ही यहां हर वर्ष श्रीराम जन्म से लेकर श्रीराम विवाह तक की भावनात्मक झांकियां, गीत, संवाद और मंचन होते हैं। युवाओं से लेकर वृद्ध तक सबकी भागीदारी रहती है; चूल्हा-चक्की, खेत-खलिहान, बाजार और चौपाल तक बस ‘रामायण’ ही गूंजता है।इस वर्ष यह आयोजन 21 नवंबर 2025 से 25 नवंबर 2025 तक प्रतिदिन रात्रि 7:00 बजे से किया जाएगा। कार्यक्रम श्रृंखला इस प्रकार रहेगी—
21 नवम्बर: श्रीराम जन्म
22 नवम्बर: ताड़का वध
23 नवम्बर: फुलवारी लीला
24 नवम्बर: धनुष यज्ञ
25 नवम्बर: भव्य श्रीराम विवाह महोत्सव

सदियों पुरानी इस परंपरा को जीवंत रखने के लिए ग्रामवासी लगातार प्रयासरत हैं। जहां तेजी से बदलती दुनिया में लोग अपनी जड़ों और संस्कारों से दूर हो रहे हैं, वहीं मलहद के लोग, अपनी रामलीला और ठाकुरबाड़ी मंदिर के प्रति गहरी निष्ठा रखते हैं। यहां का राम विवाह महोत्सव न केवल स्थानीय संस्कृति का उत्सव है, बल्कि सद्भाव, सामाजिक एकता और धर्मनिष्ठ सहयोग का भी उदाहरण बन चुका है��।मंदिर जीर्णोद्धार के लिए समाज से “नल-नील” और “हनुमान” जैसे समर्पित लोगों की आवश्यकता जताकर समिति ने मंदिर निर्माण को केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि ‘आस्था और संस्कृति का संरक्षण’ बताया है। समिति ने सभी श्रीराम भक्तों, रामलीला प्रेमियों और ग्रामवासियों से आग्र्रह किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में इस महोत्सव में सम्मिलित हों, इसे सफल बनाएं और मंदिर जीर्णोद्धार में तन-मन-धन से सहयोग करें।मलहद की परंपरा यही है—समष्टि की साधना और सेवा के साथ आस्था का उत्सव मनाना। कभी ‘राम’ के संवाद में, कभी सीता माता की झांकी में और कभी हनुमान की भक्ति में यह गांव रम जाता है, यही उसकी असली पहचान है



